वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका के उच्च टैरिफ की वजह से हड़कंप मचा है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव भारत पर पड़ा है, जिस पर अमेरिका ने कुल 50 फीसदी तक का आयात शुल्क लगाया है। बीते कुछ दिनों में भारत ने ब्रिटेन, यूरोपीय संघ समेत कई पक्षों से मुफ्त व्यापार समझौता (एफटीए) पर मुहर लगाकर भविष्य में अमेरिकी टैरिफ के प्रभावों को कम करने की कोशिश की है। हालांकि, तत्कालिक स्तर पर भी कई कदम उठाए गए हैं। अब इन कदमों को धरातल पर उतारने और भारतीय अर्थव्यवस्था की आगे की चाल तय करने के लिए 1 फरवरी 2026 को पेश होने वाले केंद्रीय बजट बेहद अहम होने वाला है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत पर ट्रंप के टैरिफ का लंबी अवधि में क्या असर पड़ सकता है? मोदी सरकार इस साल कैसे बजट के जरिए अमेरिकी टैरिफ के प्रभावों को और कम कर सकती है? कैसे इन कदमों से तात्कालिक से लेकर लंबी अवधि के लाभ हासिल करने की तैयारी की जा रही है? बजट में इसे लेकर क्या एलान होने की संभावना है?
पहले जानें- ट्रंप के टैरिफ का भारत पर क्या असर?
भारत से अमेरिका को होने वाले कुछ निर्यातों पर 50% तक के टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है। ट्रंप ने इनमें 25 फीसदी टैरिफ अमेरिकी व्यापार घाटे को कम करने का हवाला देते हुए लगाया है, जबकि अतिरिक्त 25 प्रतिशत रूस से तेल खरीदने के लिए लगाया गया है। इसका असर भारत के कई सेक्टर्स पर पड़ा है। खास बात यह है कि ट्रंप के इन टैरिफ से भारत की निर्यात अर्थव्यवस्था कुछ धीमी पड़ी है, जो कि देश के पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनने में बाधा पैदा कर रही है।
प्रभावित क्षेत्र: कपड़ा, चमड़ा, खिलौने, गहने, ऑटो पार्ट्स, श्रम-प्रधान क्षेत्र।
व्यापार में गिरावट: आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 में अमेरिका को होने वाले भारत के माल निर्यात में 1.83% की गिरावट देखी गई है। चूंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, इसलिए ये टैरिफ एक बड़ी बाधा बन सकते हैं।
आगे क्या संभावना: अमेरिका अपने कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजारों को खोलने की मांग कर रहा है। ऐसे में भारत पर अपने इन क्षेत्रों को विदेशी उत्पादों से बचाने का बड़ा दबाव है। अगर भारत इन खतरों से निपटने के तरीके जल्द नहीं निकालता तो देश की आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
रक्षा क्षेत्र और ट्रंप-प्रूफ सौदे
ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार ट्रंप के टैरिफ से बचने के लिए सिर्फ अपनी आर्थिक सुरक्षा को ही प्राथमिकता देने की कोशिश में है, बल्कि सरकार अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करने के लिए उसके साथ कुछ रक्षा समझौतों के लिए बजट तय कर सकती है। इनमें कुछ हथियारों की खरीद और तकनीक हस्तांतरण के लिए प्रावधान किए जाने की संभावना है। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा समझौते कुल मिलाकर दोनों देशों के समग्र व्यापार समझौते में शामिल हो सकते हैं।
जीई एफ414 इंजन और प्रीडेटर ड्रोन: बजट में लड़ाकू विमानों के इंजन और ड्रोन सौदों के लिए शुरुआती पूंजी का आवंटन। 31 एमक्यू-9बी प्रीडेटर ड्रोन्स के लिए हुए 32 हजार करोड़ रुपये के समझौते के लिए प्रस्ताव।
एमआरओ हब का निर्माण: भारत में अमेरिकी उपकरणों के रखरखाव (एमआरओ) के लिए हब बनाने के लिए रकम तय की जा सकती है, जिससे घरेलू स्तर पर उच्च तकनीक वाली नौकरियां पैदा होंगी।
एमएसएमई और रिसर्च: रक्षा इकोसिस्टम में सक्रिय 16,000 स्टार्ट्प्स और एमएसएमई को स्वायत्त प्रणालियों और एआई में नेतृत्व करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के रिसर्च एंड डेवलपमेंट फंड से मदद दिए जाने की संभावना। इससे 1.91 लाख स्टार्टअप्स और एमएसएमई नौकरियों को बचाने का लक्ष्य।
- प्रमुख विशेषज्ञों का क्या कहना है?
भारत के अलग-अलग अर्थशास्त्रियों ने बजट को लेकर मीडिया से बात भी की है। इसमें निर्यात गंतव्यों में विविधता लाने से लेकर भारत के संकटग्रस्त क्षेत्रों को सहायता प्रदान करने के प्रावधान बनाने के भी सुझाव दिए गए हैं।
डॉ. डी.के. श्रीवास्तव (अर्न्स्ट एंड यंग): भारत को अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लानी चाहिए और लागत प्रतिस्पर्धा बढ़ानी चाहिए।
ऋषि शाह (ग्रांट थॉर्न्टन भारत): बजट को व्यापार करने की लागत कम करने और विनियामक निश्चितता पर ध्यान देना चाहिए।
मदन सबनवीस (बैंक ऑफ बड़ौदा): कपड़ा, चमड़ा और रत्न जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को विशेष बफर या सहायता के लिए प्रावधान होना चाहिए।
युविका सिंघल (क्वांटइको): सीमा शुल्क ढांचे में बदलाव और ‘इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर’ को ठीक करना जरूरी है।
रनेन बनर्जी (पीडब्ल्यूसी इंडिया): एमएसएमई क्षेत्र के लिए क्रेडिट गारंटी योजना और सामान्य बुनियादी ढांचे में आवंटन बढ़ाना चाहिए।
- रणनीतिक स्वायत्तता
अर्थशास्त्री और यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन से संबद्ध फैकल्टी सदस्य बद्री नारायण गोपालकृष्णन के मुताबिक, अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव और ईवी-एआई को बढ़ावा देने के लिए भारत अपनी अर्थव्यवस्था को एक किले की तरह सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके तहत क्रिटिकल मिनरल्स मिशन के लिए बजट में प्रावधान किए जा सकते हैं, ताकि देश में सेमीकंडक्टर और ईवी बैटरी के लिए आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित किया जा सके और बाहरी पाबंदियों का असर कम हो सके।
Source of News:- amarujala.com
बाजार विस्तार: भारत की रणनीति सिर्फ अमेरिका पर निर्भर न रहकर दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका जैसे नए बाजारों में भारतीय उत्पादों (जैसे ब्रह्मोस मिसाइल) के लिए एक्जिम बैंक के जरिए क्रेडिट लाइन बढ़ाने की भी रहेगी। इसके लिए बजट में प्रस्ताव पेश हो सकता है।







