Lalu Prasad Yadav Ranjan Yadav Story: राष्ट्रीय जनता दल में तेजस्वी यादव को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा होते ही बिहार की राजनीति में एक पुराना सवाल फिर उभर आया है. आखिर तेजस्वी को पूर्ण अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया गया? क्या यह केवल संगठनात्मक निर्णय है या इसके पीछे लालू प्रसाद यादव का पुराना अनुभव और राजनीतिक डर छिपा है? जवाब जानने के लिए हमें 2001 की उस कहानी में जाना होगा जब लालू यादव ने एक फैसला लिया और बाद के दौर में फिर खुद उसे अपनी सबसे बड़ी गलती बताया था.
पटना. बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव को पार्टी और सत्ता पर मजबूत पकड़ के लिए जाना जाता है और अब उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है. राजद (RJD) की राजनीति की दृष्टि से देखिए तो वर्तमान में तेजस्वी यादव RJD का सबसे बड़ा चेहरा हैं. वे बिहार विधानसभा नेता प्रतिपक्ष हैं और इससे पहले वह बिहार के उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ बिहार में सरकार चला चुके हैं और पार्टी का जनाधार उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है. इसके बावजूद उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं, बल्कि कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है. साफ है कि राजद की वास्तविक (आधिकारिक) कमान अभी भी औपचारिक रूप से लालू प्रसाद यादव के पास है. बस यही निर्णय राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. इस विषय के सामने आने के बाद राजनीति के जानकार 2001 का एक वाकया सुनाते हैं जब लालू यादव को अपनी गलती का अनुभव हुआ और उन्होंने तत्काल भूल सुधार किया था.
दरअसल, बहुत कम लोग जानते हैं कि वर्ष 2001 में एक ऐसा वक्त भी आया था, जब जेल में रहते हुए लिया गया उनका एक फैसला RJD के लिए बड़ा संकट बन गया. यह किस्सा है डॉ. रंजन प्रसाद यादव से जुड़ा हुआ जिन्हें लालू यादव ने राजद का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था और फिर कुछ ही महीनों में उनको खुद हटाना पड़ा था. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना लालू यादव का एक संतुलित कदम है. इससे संगठन में उनका कद तो बढ़ा है पर सत्ता का पूरा नियंत्रण एक हाथ में नहीं गया. ऐसे में आइए हम डॉ रंजन यादव से जुड़ा पूरा मामला जानते हैं.
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चारा घोटाला: जेल के भीतर से राजनीति
उस दौर में चारा घोटाला मामला 1996 से चल रहा था. लालू प्रसाद यादव को अलग-अलग मामलों में जेल और जमानत के दौर से गुजरना पड़ा. साल 2000-2001 के बीच एक समय ऐसा आया जब लालू जेल में थे और बिहार की सत्ता राबड़ी देवी के हाथ में थी. लेकिन असली नियंत्रण लालू के पास ही था. जेल से ही वे सरकार और पार्टी दोनों को निर्देश देते थे. लालू यादव यह जानते तो थे कि सत्ता का विकेंद्रीकरण उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन उनके सामने विकल्प नहीं था. ऐसे भी छात्र राजनीति के दिनों से ही डॉ रंजन यादव पर वह भरोसा करते रहे और रंजन यादव भी उनके विश्वसनीय बने रहे थे.








